(निर्देश = वैयाकरण कृपया समझें कि सरलीकृत करने के लिए यथासूत्र लेख नहीं है यह)
3) यदि स् (जो पहले ः था) के परे श् ष् स् हो, तो क्रमशः श् ष् स् के रूप लेगा विकल्प से।
हरिस् + शेते = हरिश्शेते/हरिः शेते
रामस् + षष्ठः = रामष्षष्ठः/रामः षष्ठः
बालास् + सन्ति = बालास्सन्ति/बालाः सन्ति।
4) अब अकारोत्तर ः को ही देखेंगे।
(क) अकार + ः के आगे अ हो तो
अः को 'ओ' करो। जैसे
रामः + अस्ति (राम के म में अ छुपा हुआ है, ध्यान रखना। र्+आ+म्+अ ऐसा वर्णविच्छेद है।)
रामः + अस्ति = रामो अस्ति = रामोSस्ति।
कृष्णः + अधिशेते वैकुण्ठम् = कृष्णो अधिशेते = कृष्णोSधिशेते वैकुण्ठम्।
(ध्यान देना यह नियम सिर्फ अकारोत्तर विसर्ग के लिये है, हरिः+अधिशेते में ओ न करना)।
(ख) अ+ः के आगे वर्ग के 3,4,5 अक्षर (जैसे ग्,घ्,ङ्, ज्,झ्,ञ्, आदि और हयवरल परे हो तो भी "अः" इस पूरे को "ओ" करो।) जैसे:-
रामः + गच्छति = रामो गच्छति।
कृष्णः + हरति = कृष्णो हरति।
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अपवाद:-
उपर्युक्त नियम मात्र स् को आदिष्ट (replaced) विसर्ग के लिए हैं, न कि र् को आदिष्ट विसर्ग के लिए। जैसे:-
रामस्+गच्छति = रामः+गच्छति। तब रामो गच्छति बना।।
लेकिन प्रातर् शब्द है, उसमे र् का ः होके प्रातः बनता है। अतः
प्रातर् + गच्छति = प्रातर्गच्छति।
प्रातर् + अत्र = प्रातरत्र ।
यहाँ पर र् का ः होगा ही नहीं, सीधा वर्णसंयोजन होगा। र् को विसर्ग मात्र क्,ख्,च्,छ् जैसे वर्ग के प्रारंभ के 1-2 अक्षर परे रहते और श्,ष्,स् परे रहते है फिर 1,2,3 नियम यथावत् लगेंगे।
जैसे प्रातः तरति = प्रातस्तरति।
प्रातः चिनोति = प्रातश्चिनोति
प्रातः सृजति = प्रातस्सृजति/प्रातः सृजति।
वर्ग के 3,4,5, अक्षर परे रहते रकारान्त का विसर्ग होगा ही नहीं।
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