✅ भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों शहीद भगत सिंह, सुखदेव थापर, और शिवराम राजगुरु को श्रद्धांजलि देने के लिए आज के दिन पूरा भारत "शहीद दिवस" मनाता है। जिन्हें वर्ष 1931 में 23 मार्च के दिन ब्रिटिश शासकों ने लाहौर जेल में फांसी दी थी।
⌛️ इतिहास :
• भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन पी. सॉन्डर्स की हत्या के आरोप में फांसी दी गई थी।
• वर्ष 1928 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में राजनीतिक स्थिति के बारे में रिपोर्ट करने के लिए जॉन साइमन की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया मगर विरोधाभासी नियमों से सजे इस पक्षपाती आयोग के विरोध में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में 30 अक्टूबर 1928 (लाहौर) को एक अहिंसक आंदोलन किया गया तथा "साइमन गो-बैक" के नारे लगाए गए थे। आंदोलन से क्रोधित हो पुलिस अधीक्षक जेम्स ए स्कॉट के आदेश पर हुए लाठीचार्ज में कई आन्दोलनकारी बुरी तरह घायल हुए और कथित तौर पर स्कॉट द्वारा लाला लाजपत पर व्यक्तिगत हमला किया गया जिसके कारण उनकी मृत्यु हो गई थी।
• इस घटना का बदला लेने के लिए ही भगत सिंह और राजगुरु ने 17 दिसंबर 1928 को गलत निशानदेही पर सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन पी. सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी जिसमें सुखदेव थापर और चंद्रशेखर आज़ाद का भी सहयोग था।
• हालांकि, यह योजना मूल रूप से सॉन्डर्स के लिए नहीं बल्कि जेम्स स्कॉट की हत्या के लिए बनाई गई थी जिन्होंने लाठीचार्ज का आदेश दिया था।
• 1 मई, 1930 को एक विशेष न्यायाधिकरण की स्थापना तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन के निर्देश पर की गई। ट्रिब्यूनल ने 7 अक्टूबर, 1930 को अपने 300 पृष्ठों के निर्णय में भगत सिंह, सुखदेव थापर व शिवराम राजगुरु की सॉन्डर्स की हत्या में भागीदारी की पुष्टि की। सजा के विरोध में पनपे भारी जनांदोलन के बीच तयशुदा दिन से पहले ही 23 मार्च 1931 को तीनों युवाओं को लाहौर जेल में फांसी दे दी गई।
• मृत्यु से पहले तीनों क्रांतिकारियों ने 'इंकलाब जिंदाबाद' के तथा 'ब्रिटिश साम्राज्यवाद’ के खिलाफ़ बुलंद आवाज़ में नारे लगाए थे।
• इस पूरे मामले के दौरान जब अन्य क्रांतिकारियों ने तीनों को छुड़ाने हेतु भगत सिंह के पास सन्देश पहुँचाया था तो उनका सिर्फ़ यही कहना था कि “वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं। वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं, मेरी आत्मा को नहीं।”
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