धर्म के वास्तविक मायने और आज की धर्म की स्वार्थमूलक परिभाषा?

जानिए आज विशेष 📋📈

➡️ धर्म का ओज
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✔️धर्म के यथार्थ स्वरूप को न जानकर अनेक लोग अज्ञानतावश धर्म के नाम से अंधता और कट्टरता का चोला ओढ़ लेते हैं और फिर स्वार्थवश फैलाए गए पाखंड, अनाचार, ढोंग, अंधविश्वास और आडंबर के जाल में जकड़कर, बाहरी क्रियाकलाप को धर्म मानकर धर्म की अलग धारणा स्थापित करते हैं। 

✔️इसके कारण मानव समाज में संवेदहीनता, असंवेदनशीलता, भय, असुरक्षा की भावना, पहचान का संकट आदि उत्पन्न होता और फिर विभिन्न समुदाय में परस्पर संघर्ष का कारण बनता हैं।

✔️यह दोष धर्म के मूल तत्वों का नहीं, बल्कि संगठित धर्मों की विवादास्पद भूमिका से संबंधित है। वस्तुतः संयुक्त रूप से परमात्मा का स्मरण, तत्व-चिंतन, आत्म-निरीक्षण, कल्याणकारी योजनाओं का निर्धारण-क्रियान्वयन आदि कारणों-प्रयोजनों के लिए धर्म स्थल (मन्दिर,मस्जिद,चर्च) बने, लेकिन अज्ञान और कट्टरता से उपजी असहिष्णुता ने धर्म और धर्म स्थलों को ही अलगाव का आधार बना दिया और उसका धर्म या इसका धर्म ने समाज और मानवता के बीच एक खाई बना डाली। 

✔️अकसर कुछ लोग इसलिए भी धर्म की उपेक्षा करते हैं कि उन्हें सच्चे धर्म का बोध नहीं है|

✔️कुछ लोग पंथों, मजहबों द्वारा स्वार्थ के लिए फैलाए गए क्रियाकलापों को धर्म मानते हैं। अतः धर्म का वास्तविक सार्वभौम एवं विश्वमानव के लिए हितकारी समान स्वरूप को समझने की आवश्यकता है। हमें धर्म के लक्षणों को देखना चाहिए। मानव धर्मशास्त्र में धर्म के लक्षणों को प्रतिपादित करते हए लिखा गया है-
 
👉 'धतिः क्षमा दमों अस्तेयं शौचं इंद्रिय निग्रहः। धीविद्या सत्यम अक्रोध: दशकं धर्म लक्षणः।'
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✔️अर्थात धैर्य, क्षमा, मन का निग्रह, चोरी का परित्याग, शरीर की शुद्धि, मन एवं आत्मा की पवित्रता, इंद्रियों का संयम, विद्या, सत्य अक्रोध धर्म के लक्षण हैं। 

✔️वास्तव में धर्म श्रेष्ठ मानव मूल्यों, उत्तम कर्तव्यों की समष्टि का नाम है। धर्म तो मनुष्य के वैयक्तिक, सामाजिक एवं आत्मिक कर्तव्यों की समष्टि का नाम है। धर्म मनुष्य के वैयक्तिक, सामाजिक एवं आत्मिक कर्तव्यों को कहते हैं। 

✔️जब हम कहते हैं-माता, पिता, भाई, पुत्र, गुरु, विद्यार्थी, शिक्षक, नागरिक का धर्म ,तो धर्म कर्तव्यपरक आचरण को व्यक्त करता है। जब हम कहते हैं- अहिंसा सत्य धर्म है, दया धर्म है, शिष्टाचार, ब्रह्मचर्य धर्म है तो यह सदाचार संज्ञक हो जाता है।

✔️जब कहा जाता है कि अपराधी को दंड दो तो धर्म न्यायपरक हो जाता है। जब कहा जाता है शौच धर्म है, संतोष धर्म, तप धर्म है, ईश्वर भक्ति है तो धर्म अध्यात्मपरक हो जाता है। जब हम कहते हैं कि स्वाध्याय धर्म है, ईश्वर का नाम जब धर्म है, योग धर्म है, यज्ञ धर्म है, प्रार्थना करना धर्म है, तो धर्म साधनापरक हो जाता है। 

✔️वस्तुतः मानव मात्र की शारीरिक, मानसिक, आत्मिक प्रगति के जो उत्तर विधि-विधान एवं आदेश, उपदेश एवं कर्तव्य हैं, वे सब धर्म के अंतर्गत आते हैं। 

✔️अतः धर्म वह आचरणपरक विधा है जिसके धारण करने वाले को सम्यक ज्ञान, दर्शन, व्यवहार एवं संयम सिखा देता है। परहित चिंतन एवं लोक कल्याण ही धर्म की भावना है। धर्म न तो वस्त्र और आभूषणों में मिलता है, न बाहरी आडंबर में। धर्म तो महापुरुष, सज्जन धर्मात्माओं के व्यवहार में मिलता है। धर्म मानवता की धुरी प्राण है, जीवन संजीवनी है जिसके बिना मनुष्य में मानवता का अभाव दिखता है। अगर सही अर्थ में धर्म को धारण ना करें तो वह पशुता ही है। कहा भी गया है-

👉 'धर्मेण हीना पशुभिः समाना'

✔️वस्तुतः सत्य के अनुसार आचरण धर्म है। सुख का मूल धर्म है। जहां धर्म है वहीं ओज, तेज, बल, जितेन्द्रिय, यश, ऐश्वर्य एवं जय है। धर्म की व्याख्या में अधर्म नहीं करना भी धर्म है।

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