शरारत की पुड़िया ।।


मैं आज अपने घर लौटा तो घर की हालत देखकर मेरा सिर चकरा गया। टेबल पर किताबें उल्टी-पुल्टी पड़ी थीं। कुशन जो सोफे पर रहता था, वह ज़मीन पर गिरा हुआ था । कुशन के हाथ-पैर तो होते नहीं, जो खुद नीचे गिर जाए? ज़रूर यहाँ कोई आया है और जान बूझकर ऐसा किया है।

घर के लोग बुआ की बेटी की शादी की तैयारियों में लगे हुए हैं। उन्होंने इस बात पर ध्यान भी नहीं दिया होगा कि घर कितना बिखरा हुआ है। अब इस बात का पता मुझे ही लगाना होगा कि ये सब किस की हरकत है! मेरे दिमाग़ में अभी भी यही प्रश्न चल रहा है कि आखिर ये सब किसने किया होगा? यही सोचते हुए मैंने कपड़े बदले । थोड़ा आराम किया। फिर अपना जासूसी दिमाग चलाने लगा। लेकिन कुछ पता नहीं चल पा रहा था कि ये कैसे हुआ। जब कुछ समझ में नहीं आया तो मैं बरामदे में जाकर बैठ गया।

अचानक मेरी नज़र हिलते हुए पर्दे पर पड़ी। मैं दबे क़दमों से पर्दे की तरफ बढ़ा । फिर धीरे से पर्दा हटा दिया। वहाँ एक भूरी बिल्ली थी। मुझे देखते ही वह 'म्याऊँ म्याऊँ करने लगी।

शायद वह भूखी थी। मैंने उसे कटोरी में दूध दिया।

मुझे हँसी आ गई। क्योंकि मैंने जो कुछ भी सोचा था, वैसा कुछ भी नहीं था। यह सारा काम

इसी शरारत की पुड़िया का था!

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