एक मैदान था । बल्लू बैल घास चर रहा था। बल्लू को देखकर उसकी दोस्त भनभन मक्खी वहाँ आ गई। अचानक! उसे शरारत सूझी। वह बल्लू के कान पर 'भन भन करने लगी। फिर उड़कर उसकी सींग पर जा बैठी। इस तरह वह कभी बल्लू की पीठ पर, तो कभी कान पर बैठ जाती । बल्लू आराम से घास चरता रहा । भनभन की बात पर उसने ध्यान ही नहीं दिया। इस बार भनभन बल्लू के कान पर जा भिनभिनाई, "मैं तुम्हें परेशान तो नहीं कर रही हूँ न ? लगता है, मेरा भार तुमसे सहन नहीं हो पा रहा है।" वह इतराती हुई बोली, "बस तुम कह नहीं पा रहे हो। कह दो, मैं बिल्कुल बुरा नहीं मानूँगी। मैं कहीं और जाकर बैठ जाऊँगी।"
बल्लू बोला, "तुम्हारे बैठने से मेरे शरीर पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। तुम बहुत छोटी और हल्की हो । तुम्हारा वज़न तो मैं आराम से सहन कर सकता हूँ। लेकिन तुम्हारी भिनभिनाहट से मैं लाचार हो जाता हूँ। फिर हँसते हुए कहा, "लेकिन याद रखना, अगर मैंने गलती से तुम्हारे ऊपर अपना एक पैर भी रख दिया, तो तुम्हारा क्या हाल होगा?" भनभन कुछ सोचने लगी। फिर कहा, "अरे! नहीं-नहीं बल्लू भैया ! ऐसा मत करना। मैं तो बस मज़ाक कर रही थी। यह कहते हुए वह खिलखिला कर हँसने लगी। उसे हँसता देखकर बल्लू भी हँसने लगा ।
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