किसी भी प्रतियोगी परीक्षा का स्तर और प्रकृति को समझना बहुत ही जटिल कार्य है,प्रतिस्पर्धा की इस गलाकाट प्रतियोगिता मे यदि हम इसको खुद से समझने का प्रयास करते है तो समय की बहुत हानि होती है। आचार्य चाणक्य का भी कथन है कि हमे दूसरों की गलती से भी सीखना चाहिए खुद ही गलती करके सीखेगे तो यह जीवन भी छोटा पड़ जायेगा ऐसे सीनियर्स का यह प्रयास सराहनीय है हमे इसका स्वागत और सीनियर्स का धन्यवाद करना चाहिए ।
"गायत्री मंत्र का अर्थ"
-
*(ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योन:
प्रचोदयात्)*
*उस प्राणस्वरूप, दु:खनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप...

0 comments:
Post a Comment
We love hearing from our Readers! Please keep comments respectful and on-topic.