भारत में अंतर्राज्यीय जल विवाद न्यायाधिकरण: स्थापना वर्ष और संबंधित राज्य

भारत में नदियों को जीवनदायिनी माना जाता है, लेकिन जब एक ही नदी कई राज्यों से होकर बहती है, तो उसके जल-बंटवारे को लेकर विवाद उत्पन्न होना स्वाभाविक है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 262 और अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State River Water Disputes Act) के तहत केंद्र सरकार ऐसे विवादों के समाधान के लिए विशेष न्यायाधिकरण (Tribunals) गठित करती है।

​प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC, State PSC, SSC) की दृष्टि से यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है। आइए जानते हैं भारत के प्रमुख जल विवाद न्यायाधिकरणों, उनकी स्थापना के वर्ष और संबंधित राज्यों के बारे में:

​अंतर्राज्यीय जल विवाद न्यायाधिकरण: एक नज़र में

क्र. सं.

न्यायाधिकरण का नाम

स्थापना वर्ष

संबंधित राज्य / केंद्र शासित प्रदेश

1.

कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण - I

1969

महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश

2.

गोदावरी जल विवाद न्यायाधिकरण

1969

महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं ओडिशा

3.

नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण

1969

राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र

4.

रावी तथा व्यास जल विवाद न्यायाधिकरण

1986

पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान

5.

कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण

1990

कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु एवं पुडुचेरी

6.

कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण - II

2004

महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश

7.

वंशधारा जल विवाद न्यायाधिकरण

2010

ओडिशा एवं आंध्र प्रदेश

8.

महादायी (मांडवी) जल विवाद न्यायाधिकरण

2010

गोवा, कर्नाटक एवं महाराष्ट्र

9.

महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण

2018

ओडिशा एवं छत्तीसगढ़

परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु (Quick Exam Facts)

  • ​संवैधानिक प्रावधान: संविधान के अनुच्छेद 262 के तहत संसद को अंतर्राज्यीय नदियों और नदी घाटियों के जल के उपयोग, वितरण और नियंत्रण से संबंधित किसी भी विवाद के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है।
  • ​सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार: अनुच्छेद 262(2) के अनुसार, संसद कानून बनाकर ऐसे किसी भी विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय के क्षेत्राधिकार को समाप्त कर सकती है (जब तक मामला न्यायाधिकरण के समक्ष हो)।
  • ​1969 का महत्व: वर्ष 1969 में एक साथ तीन प्रमुख न्यायाधिकरण गठित किए गए थे—कृष्णा-I, गोदावरी और नर्मदा।

​Inter-State River Water Disputes Tribunals (English Summary)

  • ​Krishna Water Disputes Tribunal - I (1969): Maharashtra, Karnataka, and Andhra Pradesh

  • ​Godavari Water Disputes Tribunal (1969): Maharashtra, Karnataka, Andhra Pradesh, Madhya Pradesh, and Odisha

  • ​Narmada Water Disputes Tribunal (1969): Rajasthan, Gujarat, Madhya Pradesh, and Maharashtra

  • ​Ravi & Beas Water Disputes Tribunal (1986): Punjab, Haryana, and Rajasthan

  • ​Cauvery Water Disputes Tribunal (1990): Karnataka, Kerala, Tamil Nadu, and Puducherry

  • ​Krishna Water Disputes Tribunal - II (2004): Maharashtra, Karnataka, and Andhra Pradesh

  • ​Vansadhara Water Disputes Tribunal (2010): Odisha and Andhra Pradesh

  • ​Mahadayi Water Disputes Tribunal (2010): Goa, Karnataka, and Maharashtra

  • ​Mahanadi Water Disputes Tribunal (2018): Odisha and Chhattisgarh

​जल संसाधनों का विवेकपूर्ण और न्यायसंगत बंटवारा सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की रीढ़ है। न्यायाधिकरणों द्वारा दिए गए निर्णय राज्यों के मध्य शांतिपूर्ण जल प्रबंधन और कृषि विकास को गति देने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद (संशोधन) विधेयक [मूल रूप से 1956 के अधिनियम में संशोधन हेतु] का उद्देश्य राज्यों के बीच दशकों से लंबित रहने वाले जल विवादों के निपटारे की प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और संस्थागत बनाना है।

​विधेयक के प्रमुख प्रावधान (Key Provisions)

  1. ​एकल स्थायी न्यायाधिकरण (Standalone Permanent Tribunal):
    • ​वर्तमान में प्रत्येक नए विवाद के लिए अलग (Ad-hoc) न्यायाधिकरण गठित किया जाता है। विधेयक में सभी मौजूदा न्यायाधिकरणों को समाप्त कर एक एकल अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद न्यायाधिकरण (Inter-State River Water Disputes Tribunal) बनाने का प्रस्ताव है।
    • ​इस स्थायी न्यायाधिकरण की आवश्यकतानुसार अलग-अलग पीठें (Benches) होंगी।
  1. ​विवाद समाधान समिति (Dispute Resolution Committee - DRC):
    • ​किसी मामले को सीधे न्यायाधिकरण में भेजने के बजाय केंद्र सरकार पहले एक DRC गठित करेगी।
    • ​यह समिति संबंधित राज्यों के बीच बातचीत और मध्यस्थता के जरिए 1 वर्ष (अधिकतम 6 महीने के विस्तार के साथ) के भीतर विवाद सुलझाने का प्रयास करेगी। यदि DRC विफल रहती है, तभी मामला स्थायी न्यायाधिकरण को भेजा जाएगा।
  1. ​कड़ी समय-सीमा (Strict Time Limits):
    • ​न्यायाधिकरण की संबंधित पीठ को विवाद सौंपे जाने के बाद 2 वर्ष (अधिकतम 1 वर्ष का विस्तार) के भीतर अपना अंतिम फैसला देना होगा।
    • ​वर्तमान कानून में यह सीमा 3 वर्ष (+2 वर्ष का विस्तार) थी, जिससे प्रक्रिया वर्षों तक खिंच जाती थी।


  1. ​अंतिम निर्णय का प्रभाव और राजपत्र (Gazette) अनिवार्यता की समाप्ति:
    • ​वर्तमान व्यवस्था में न्यायाधिकरण के फैसले को सरकारी राजपत्र (Official Gazette) में प्रकाशित करने के बाद ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश जैसा बल मिलता था।
    • ​नए विधेयक के तहत राजपत्र में प्रकाशन की अनिवार्यता हटा दी गई है; न्यायाधिकरण की पीठ का निर्णय स्वतः अंतिम और सभी पक्षों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी होगा।


  1. ​राष्ट्रीय स्तर पर डेटा बैंक (Data Bank & Information System):
    • ​केंद्र सरकार को प्रत्येक नदी बेसिन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक विश्वसनीय और पारदर्शी डेटा बैंक एवं सूचना प्रणाली स्थापित करने हेतु किसी विशेषज्ञ तकनीकी एजेंसी को नियुक्त करने का अधिकार दिया गया है।

​वर्तमान विधायी स्थिति (Current Legislative Status)

  • ​लोकसभा द्वारा पारित: इस विधेयक (2019 संस्करण) को लोकसभा द्वारा जुलाई/अगस्त 2019 में पारित किया जा चुका है।

  • ​राज्यसभा में लंबित / पुनरावलोकन: लोकसभा भंग होने और नई लोकसभा के गठन के चक्रों के दौरान, यह विधेयक राज्यसभा में पूर्ण सहमति और पारित होने की प्रक्रिया के दौर से गुजरता रहा है। कई क्षेत्रीय राज्यों ने जल को राज्य सूची (State List) का विषय बताते हुए DRC के अधिकारों और केंद्र की भूमिका पर संघीय चिंताएं (Federal Concerns) जताई हैं, जिसके कारण इसे सर्वसम्मति से कानून का रूप देने पर विमर्श जारी रहा है।

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